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बचपन से ही माँ से सुनते आई हूँ “बड़ी होकर तुझे शादी कर के अपने घर जाना है; वहां तुझे घर बसाना है!” 

यह वाक्य मेरी ही तरह और भी कई लड़कियों को सुनने मिलता है और मिला होगा। कारण यह नहीं कि माँ को उसकी पुत्री से प्रेम नहीं है और इसलिए वह चाहती है की लड़की दूसरे घर चली जाए। परन्तु कारण है शादी करने की मज़बूरी। शादी एक पितृसत्तात्मक ढांचा है और चूंकि हम पितृसत्तात्मक समाज में रह रहे हैं, शादी करना अनिवार्य है। यदि कोई शादी ना करके इस ढांचे को तोड़ने की कोशिश करता है तो, पितृसत्ता के बाकी कई सारे ढांचे लड़ने झगड़ने के लिए तैनात हो जाते हैं। माने, बिना शादी के ना घर ना परिवार ना गली ना मोहल्ला, ना देश ना दुनिया, कोई भी शांति से जीने नहीं देगा। खैर, पित्रसत्ता की समझ तो नारीवाद की क्लासों से आई।

उसके पहले तो बस मां की इन बातों पर या तो रूठ जाती थी या तो गुस्सा हो जाती थी।  मैं सोचती थी की मां ने शादी कर के या मेरे परिवार, रिश्तेदारों में और भी बाकी औरतों ने शादी कर के ऐसा कौन सा आनंद उपलब्ध कर लिया जो मुझसे छूट जाएगा यदि मैंने विवाह ना किया तो..?

असल में तो मेरी मां की तरह और भी मेरे परिवार की औरतों ने, चाहे वो बहू हो या बेटी, सभी ने शादी के बाद ससुराल ही संभाला। उनकी ज़िंदगियां ससुराल के कर्म काज में ही गुंथ कर रह गईं। वो अपने लिए कोई नाम नहीं बना सकीं। ब्राह्मण समाज के जिस वर्ग से मैं आती हूं, वहां अभी भी महिलाओं की शिक्षा तो दूर शिक्षा पर ही सामान्य रूप से कोई खास गंभीरता नहीं है। ऐसे में, मुझे हमेशा पढ़ाई लिखाई में अव्वल आकर यह जताना होता था की “देखो मुझमें क्षमता है; मुझे पढ़ने दिया जाए।” जैसे तैसे पढ़ाई का संघर्ष होता रहा है। परन्तु विवाह की बात पर घर परिवार से तनाव कुछ ऐसा आता है कि उन्हें समझाना पहाड़ हिलाने जैसे मालूम होता है। 

मुझे गृहणी बनने से डर लगता है क्यूंकि ब्राह्मणी पितृसत्ता ने शादी के रिश्ते को पहले से ही असामान रूप से गढ़ा है जहां पुरुषों को न केवल अधिक विशेषाधिकार और नियंत्रण, बल्कि आर्थिक और भौतिक रूप से भी लाभ होता है। घरों के भीतर गृहणी जो काम करती है, उसे काम के रूप में नहीं बल्कि स्त्री धर्म के रूप में देखा जाता है। स्त्री धर्म के पर्दे तर असल में महिलाओं के श्रम का शोषण होता है। भला क्या पुरुषों के काम को भी कभी “काम नहीं है” ऐसा समझा गया है? नहीं। महिलाओं का श्रम घर में ‘अतिरिक्त ‘ पैदा करता है। माने, महिलाऐं घरों में जिस तरह का श्रम करती हैं, जैसे कि भोजन बनाना, कपड़े धोना, बर्तन धोना, परिवार के सदस्यों का ख्याल रखना, आदि; यदि यह सभी कार्य गृहणी करने से मना कर दे, तो इन कामों के लिए घरेलू सहायक की जरूरत होगी, जिसे हर महीने वेतन भी देना होगा और छुट्टियां भी देनी होंगी। इसके बावजूद, सहायक कितनी ईमानदारी से काम करेंगे यह निश्चित नहीं। परंतु यही सारे काम गृहणी को बिना किसी पैसे या छुट्टियों के, और खूब मन लगा कर करने होते हैं। तो, इससे हम यह देख सकते हैं कि किस तरह गृहणी इन कार्यों को करके ना केवल पैसे खर्च होने से रोकती है, बल्कि वह अतिरिक्त भी पैदा करती है जिससे मर्दों कि आमदनी में लाभ होता है। इस आमदनी पर भी गृहणी का अधिकार नहीं होता है। वह खुद बाहर जाकर पैसे तभी कमा सकती है जब उसे उसके ससुराल वाले और उसका पति  आज्ञा देंगे, जब वह पहले “सर्वगुण संपन्न” गृहणी होने की परिक्षा में सफल हो जाएगी।

क्या गृहणी को वाकई उसके श्रम का मोल मिलता है? नहीं।

वह घर में केवल सेविका बन कर रह जाती है, ऐसा घर जिस पर वह अपना हक भी नहीं जता सकती है।  इन्हीं सब पर आधारित सिलविया वाल्बी कहती हैं कि  “महिलाऐं उत्पादक वर्ग हैं और पुरुष ज़ब्त करने वाले वर्ग हैं”। यह वे इसलिए कहती हैं क्योंकि पित्रसत्ता का भौतिक आधार केवल बच्चा पैदा करने पर नहीं टिका हुआ है बल्कि वह उन सभी सामाजिक ढांचों पर आधारित है जो पुरुष को महिलाओं के श्रम को नियंत्रण में रखने के सक्षम बनाते हैं।

यदि शादी का बंधन इतना ही पवित्र होता तो उसमें महिलाओं का शोषण ना होता, उनके शोषण को सामान्य ना बना दिया गया होता।दिक्कत इस बात से नहीं है की महिलाऐं क्या करती हैं या वे क्या हैं; दिक्कत है कि उन्हें किस तरह से महत्तवपूर्ण नहीं समझा जाता है और किन्हें हक है महिलाओं को महत्तव “देने” का। 

पित्रसत्ता आधारित ही है महिलाओं के श्रम और उनकी यौनिकता पर नियंत्रण करने पे। औरतें घर में खाना बनाती हैं या कपड़े धोती हैं या सदस्यों का ख्याल रखती हैं, इस बात से दिक्कत नहीं है मुझे; दिक्कत इस बात से है कि सिर्फ महिलाऐं ही क्यों घर में ये काम करें? मर्द क्यों नहीं? और ये काम करने के बाद इन कामों को मान्यता भी मर्दों से ही मिलनी चाहिए ! यदि मर्द इन कामों की मान्यता ना करें, तो ये काम व्यर्थ हैं! 

अचरज सा होकर भी नहीं होता मुझे की कैसे मेरी मां ने, मेरी चाची ने, और उन सारी औरतों ने इन रूढ़िवादी ढांचों में रहकर, परिक्ष्रम कर कर भी प्रेम करती रहीं, अपने लिए जगह बनाती रहीं। इन परिश्रम का ही नतीजा है, इन नारीयों के संघर्ष का ही नतीजा है कि आज मैं नारीवाद सीख रही हूं; पित्रसत्ता समझ रही हूं और उसे तोड़ने की कोशिश कर रही हूं। किसी ना किसी तरह से गृहणियां इन ढांचों को तोड़ती ही रहती हैं अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में। पर क्यूंकि ये संघर्ष उनकी रोजमर्रा कि ज़िन्दगी का हिस्सा है, वह अलग से उभर कर नहीं आता। गृहणियों का शोषण और संघर्ष, दोनों ही सामान्य कर दिया गया है।

गरदा लरनर कहती हैं की कई बार महिलाओं को यह लगता है की पित्रसत्ता के कारण उन्हें बहुत फायदा है। हालांकि समझने वाली बात यह है की क्या ये फायदे वाकई में फायदे हैं? इस अवस्था को वे “पैतृक प्रभुत्व” कहती हैं। इनकी इस बात से मुझे याद आती हैं मेरी भाभी जो समझती हैं की पित्रसत्ता से उन्हें फायदा है क्योंकि इससे उन्हें कमाने नहीं जाना पड़ता। मेरे भाई कमाते हैं और वे उनकी कमाई खर्च कर सकती हैं। वरना तो उन्हें बाहर भी जाकर कमाना पड़ता और ज़िन्दगी और भी कठिन हाेजाती। समझाने पर भाभी जी समझीं की किस तरह पित्रसत्ता ही वजह है उनके भाई पर आधारित रहने का। यदि पितृसत्ता ही ना होती तो उन्हें घर में गृहणी बन कर ना रहना होता, वो खुद पर निर्भर होतीं और ना की किसी और पर।

मेरी भाभी के तरह और भी कई सारी गृहणियों ने और महिलाओं ने पितृसत्ता को अपने अंदर इसी तरह बसा लिया है क्यौंकि हम महिलाओं को यही बसाने वाली प्रक्रिया सिखाई जाती है। जो इस प्रक्रिया में सफल होंगे, पितृसत्ता उन महिलाओं का सम्मान करेगी; जो नहीं होंगी, या नहीं करना चाहती, उन्हें “कुलटा” और “कुलक्षणी” का नाम देकर अपमानित करेगी।

मुझे यह नहीं कहना है कि महिलाऐं या गृहणियां अबला हैं या सिर्फ उन्हें ही पितृसत्ता के दुरपरिणाम झेलने पड़ते हैं; पुरुष भी पित्रसत्ता के कारण बहुत झेलते हैं पर यह अमानवियकरण किसी भी तरह से महिलाओं कि अधीनता का सामना नहीं कर सकता है। ना ही तो मैं यह कह रही हुं की पितृसत्ता को मातृसत्ता में बदल दिया जाए। कोई ऐतिहासिक सबूत मौजूद नहीं है यह जताने की लिए की मात्रसत्ता का अस्तित्व रहा है। लेकिन मातृवंश एवं मात्रस्थान के अस्तित्व अभी भी पाए जाते हैं। यह इस बात की तरफ इशारा है की समाज को संगठित करने के वैकल्पिक तरीके भी मौजूद हैं।

ऐसे में मेरा मन यह सवाल करता है की “मैं क्यों बनूं गृहणी? मैं ही अपना घर छोडकर क्यों जाऊं? क्यूंकि यह “संसार का नियम है”?!

या यूं कहूं की यह पितृसत्ता का नियम रहा है?

Namrata Mishra

Namrata Mishra is a Gender Culture and Development student from Krantijyoti Savitribai Phule Women's studies Centre
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Namrata Mishra is a Gender Culture and Development student from Krantijyoti Savitribai Phule Women's studies Centre

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